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आमुख

भौगोलिक शब्दकोष के अनुसार समाज में प्रचलित रीति-रिवाज, विश्वास, नीति, तकनीक, कला आदि विशेषताएं संस्कृति है जिसका संचार एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में क्रमानुगत होता है । व्यक्ति और समाज की शैली का प्राथमिक तत्त्व संस्कृति, पर्यावरण परिस्थितियों से प्रभावित रहती है । मानव निर्मित सांस्कृतिक संरचना में प्राकृतिक परिवेश अभिव्यक्त होता है ।

दर्शन शास्त्र शब्दकोष में जीवन शैली को संस्कृति कहा गया है जिसमें अभिवृत्ति, मान्यताएं, विश्वास, कला, विज्ञान, अनुभूतियां, क्रियाकलाप एवं वैचारिक प्रकृति सम्मिलित है ।
एक अन्य अर्थ में, मैथ्यू आर्नल्ड के अनुसार ‘‘संस्कृति का अर्थ है कि विश्व में जो कुछ सर्वोत्तम जाना गया है उससे स्वयम् को परिचित करवाना ।’’
मानव के आचार-व्यवहार के समस्त आयामों की भांति संस्कृति के उदात्त मूल्यों को भी भाषा के माध्यम से ही अभिव्यक्ति मिलती है । अत: भाषा और संस्कृति का परस्पर घनिष्ठ सम्बंध है । अपने प्रान्त एवं जनपदों की भाषा और संस्कृति राष्ट्रीय सांस्कृतिक आदर्शों के साथ आंचलिक विशेषताओं से सम्पन्न होती है जिनके प्रति जनमानस का गहरा अपनत्व समाया होता है और इसी में राष्ट्रीय और क्षेत्रीय अस्मिता समाहित रहती है । इस सम्बंध में एक प्रसंग यहां उल्लेखनीय है -

भारतवर्ष के बंगाल प्रान्त के उच्चकोटि के लेखक एवं ऐतिहासिक राष्ट्रीय गीत वन्दे मातरम् के रचयिता बंकिम चन्द्र चटर्जी बंगाल में अनेक वर्षों तक न्यायाधीश के पद पर आसीन रहें हैं । वे वकीलों को अंग्रेजी की जगह बंगला भाषा का उपयोग करने की प्रेरणा दिया करते थे । उनका स्पष्ट मत था कि संस्कृति का भाषा के साथ अटूट सम्बंध है |
एक दिन उनके न्यायालय में एक अंग्रेज वकील किसी मुकद्दमे की पैरवी करने आया । उस वकील ने बंकिमचन्द्र जी को बंगला में बोलते सुना तो उसने कहा कि अंग्रेजी, शासन की भाषा है । आप इसकी जगह थोड़े से क्षेत्र की भाषा बांगला का उपयोग क्यों करते हैं ? और आप तो अंग्रेजी के अच्छे जानकार भी हैं ।

उन्होंने रुक कर कहा ‘‘वकील साहब ! आप क्या समझते हैं कि भारतवासी अंग्रेजों के अधीन होने के बावजूद अंग्रेज बनाए जा सकते हैं ? आपकी भाषा का प्रभाव कुछ लाख लोगों पर पड़ सकता है, किन्तु अधिकांश भारतवासी अपनी भाषा व संस्कृति से ही प्रेरणा प्राप्त करेंगे ।’’

हिमाचल प्रदेश की भाषा और संस्कृति की अपनी विशिष्ट पहचान एवं अस्मिता है जिसमें संस्कृत भाषा तथा राष्ट्रीय सनातन संस्कृति की सभी श्रेष्ठ धाराएं प्रवाहमान् हैं । यहां की भाषा एवं संस्कृति में जीवन के सभी पक्षों की सशक्त अभिव्यक्ति विद्यमान है । आधुनिकता का कोलाहल प्रदेश की संस्कृति पर भी अपना प्रभाव छोड़ रहा है । अत: संस्कृति की मूल धारा का संरक्षण एवं प्रोत्साहन अत्यन्त आवश्यक है । इसी उद्देश्य से वर्ष 1973 में भाषा एवं संस्कृति विभाग, हिमाचल प्रदेश की स्थापना हुई है । तब से विभाग अपने दायित्वों का सक्रियतापूर्वक निर्वहन करता आ रहा है ।

विभाग की विभिन्न गतिविधियों को सुचारू रूप से निष्पादित करने के उद्देश्य से निम्नलिखित प्रमुख अनुभागों का गठन किया गया है :-

1-भाषाएं,  2-ललितकला,  3-निष्पादनकला,  4-पुरातत्त्व,  5-संग्रहालय,  
6-अभिलेखागार,  7-मंदिर प्रबन्धन

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यह सर्वमान्य तथ्य है कि आदिकाल से भारतीय संस्कृति जीवन्त रूप में निरन्तर प्रवाहमान है । कई उत्थान और पतन, कई उत्कर्ष-अपकर्ष, समय-समय पर आते-जाते रहे, परन्तु हमारी संस्कृति और इतिहास की संजीवनी शक्ति का अवसान कभी नहीं हुआ । मानवीय गुणों से परिपूर्ण भारतवर्ष की पारम्परिक संस्कृति के सभी श्रेष्ठमूल्य अपनी आंचलिक विशेषताओं के साथ हिमाचल प्रदेश की लोकसंस्कृति में भली प्रकार समाहित हैं । इसीलिए श्रेष्ठ सांस्कृतिक परम्पराओं के लिए हिमाचल प्रदेश की विशिष्ट पहचान है ।


श्री वीरभद्र सिंह
मुख्यमंत्री, हिमाचल प्रदेश