मानवीय गुणों के संस्कारों से अनुप्राणित जीवन जीने की व्यवस्था संस्कृति
कहलाती है । विश्व परिवार ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना के साथ सब का हित चिन्तन
भारतीय संस्कृति का मूल आधार है । इसीलिए वैदिक ऋषि परंब्रह्म से प्रार्थना करते
हैं कि हे प्रभु ! हमें सब ओर से कल्याणकारी विचार प्राप्त हों -
आ नो भद्रा: क्रतवो यन्तु विश्वत: |
सर्वमंगल की कामना करते हुए ऋषि कहते हैं -
सर्वेभवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया: |
सर्वेभद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दु:खभाग भवेत् ||
अर्थात् समस्त प्राणि सुख शान्ति से पूर्ण हों, सभी रोग, व्याधि से मुक्त
रहें, किसी के भाग में कोई दुख न आए और सभी कल्याण मार्ग का दर्शन व अनुसरण करें ।
भारतवर्ष के श्रेष्ठ एवं उच्च सांस्कृतिक मूल्यों के प्रकाश में मानव
सृष्टि के संचालक एवं नियामक मनु महाराज के विश्व मानव के कल्याण पथ का सृजन करके
जयघोष किया था कि पृथ्वी के समस्त मानव इस देश के अग्रजन्मा मनुष्यों से अपने-अपने
चरित्र की शिक्षा ग्रहण करें -
एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मन: |
स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवा: ||
संस्कृति शब्द की व्याख्या विभिन्न विश्वकोषों द्वारा अलग-अलग ढंग से की गई है ।
ब्रिटेनिका विश्वकोष के अनुसार मानव के ज्ञान, धारणा और व्यवहार की एकरूप सामाजिक पद्धति, संस्कृति है जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में ग्रहण होती जाती है ।
संस्कृति में समाज में प्रचलित भाषा, विचार, धारणा, रूढि़, वर्जना, संहिता, प्रथा,
शिल्प कला, ललित कला, अनुष्ठान, शिष्टाचार तथा प्रतीकमान समाहित रहते हैं ।मानव के
क्रमिक विकास में संस्कृति की कल्याणकारी भूमिका रहती है । संस्कृति केवल पुरातन
परम्परा पर ही निर्भर रहने का ही आग्रह नहीं करती, अपितु समय और परिस्थितियों के
अनुकूल ढलने की प्रेरणा प्रदान करती है ।
कोलम्बिया विश्वकोष में संस्कृति के सम्बध में कहा गया है कि समाज में
व्याप्त जीवन मूल्य, धारणाएं तथा व्यवहार के नियमों की अंगीकृत संगठित पद्धति
संस्कृति है । सांस्कृतिक वैशिष्ट्य से ही एक-दूसरे समाज की अलग-अलग पहचान प्रकट
होती है ।
पुरातत्त्व शब्दकोष में नृ-तत्त्वविद् ई. बी. ट्यलर ने संस्कृति के बारे
में कहा है कि संस्कृति एक मनोविज्ञान है जिसमें ज्ञान, विश्वास, कला, विधि, नीति,
रीति-रिवाज तथा समाज के सदस्य के रूप में मनुष्य की अपेक्षित योग्यता और स्वभाव का
समावेश रहता है ।